लेखक : भूपेन्द्र प्रताप सिंह
(लेखक उच्चतम न्यायालय में उत्तराखंड सरकार के उप महाधिवक्ता हैं)
गौ-रक्षा आंदोलन भारतवर्ष में सबसे लंबा चलने वाला आंदोलन रहा जिसको सामाजिक, राजनैतिक तथा कानूनी, तीनों स्तरों पर बराबर लड़ा गया और अंततः जीत गौ-सेवकों व गौ-रक्षकों की हुई। माननीय उच्चतम न्यायालय ने 5 सदस्यीय कांस्टीट्यूशनल बेंच द्वारा निर्णीत ‘र्मोहम्मद हनीफ कुरेशी बनाम बिहार, 1958 एस सी सी 731’ को संशोधित करते हुए, 7 सदस्यीय कांस्टीट्यूशनल बेंच का निर्णय ‘गुजरात राज्य बनाम मिर्जापुर मोती कुरैशी कसाब (2005) 8 एस सी सी 534, 26 अक्टूबर 2005’ में यह कहा कि हर तरह और हर उम्र का गोवंश समाज एवं किसान के लिए उपयोगी तथा आर्थिक और व्यापारिक रूप से लाभप्रद है। गोवंश नैसर्गिक रूप से वर्तमान परिस्थितियों में उपयोगी ही नहीं, बल्कि आवश्यक भी है। कांस्टीट्यूशनल बेंच ने यह भी कहा कि गोवंश की उपयोगिता वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है और इनका मल और मूत्र उर्वरा शक्ति से भरपूर और दुर्लभ तत्वों से युक्त है, जो कि मानव जाति तथा पर्यावरण के लिए बहुत ही लाभप्रद है। उक्त निर्णय को लिखते हुए कांस्टीट्यूशनल बेंच के माननीय सदस्यों ने गोवंश के धार्मिक एवं वैज्ञानिक रीति-रिवाजों, आस्था आदि सभी पहलुओं को बड़े ही विस्तृत और गहनता से चर्चा करते हुए इसकी पुष्टि की है कि किसी धर्म में गोवंश के वध से संबंधित कोई संदर्भ नहीं है। यहां तक कि कुरान के किसी सूरे में गोवंश की कुर्बानी की कोई चर्चा नहीं है। ‘स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल वर्सेस आशुतोष लाहिरी,1995 एस सी सी 189’, में वैज्ञानिक आधार की चर्चा करते हुए यह भी कहा गया कि 16 वर्ष की अवधि के बाद भी गोवंश की उपयोगिता समाप्त नहीं हो जाती बल्कि एक बूढ़ा गोवंश 5 टन उपले और 343 पौंड यूरिन एक साल में देता है जो कि 20 बैलगाड़ी उर्वरा खाद के समतुल्य है ओर 4 एकड़ भूमि में होने वाली उपज के लिए पर्याप्त है,(नेशनल कमीशन ऑफ कैटल -वॉल्यूम 113, पेज 1063-1064, इस बात की पुष्टि करता है)।माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को खारिज किया कि 16 वर्ष की उम्र से ज्यादा वाले गोवंश, नैसर्गिक चारा व संपदा पर बोझ होते हैं और इसकी उपयोगिता इनके भोजन के मुकाबले व्यापारिक/वाणिज्यिक रूप से सुसंगत नहीं है। नेशनल कमीशन ऑफ कैटल की रिपोर्ट में यह बतलाया गया है कि गोवंश के मांस से कुछ दिन, व कुछ समय के लिए रोजगार प्राप्त होता है, परंतु गो-सेवा से 5000 - 6000 उपले (Cow Dung Cake) बनाए जा सकते हैं, जिसे बेचकर एक व्यक्ति अपने न्यूनतम जीवन यापन का प्रबंध कर सकता है। कुल मिलाकर, वाणिज्यिक और व्यापारिक आधार को तर्कसंगत ढंग से परीक्षित किया गया है और अंततः माननीय उच्चतम न्यायालय ने गोवंश के वध व उनके मांस के व्यापार या अन्य संबंधित चीजों को माननीय गुजरात हाई कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले को मान्य रखते हुए इस पर सदा के लिए प्रतिबंध लगा दिया।
गोवंश की रक्षा से संबंधित कानूनी लड़ाई अनवरत 2005 तक रही परंतु इसकी शुरुआत 24 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में ‘सेठ गोविंद दास’ द्वारा दिए गए प्रस्ताव से मानी जाती है, जो कि बाद में 42 वें संविधान संशोधन में अनुच्छेद 48 (48ए) और 51(51ए)(जी) में बदलाव व जोड़ के साथ पूर्ण होना माना जाता है। विनोबा भावे का 1958 आमरण अनशन की भूमिका को संवैधानिक दृष्टि के दायरे से ओझल नहीं किया जा सकता। माननीय न्यायालयों में अनुच्छेद 48 अनुच्छेद 19 (1) (जी) को लेकर बार-बार याचिकाएं गोवंश से संबंधित डाली जाती रही है और फैसले आते रहे हैं, परंतु 42 वें संविधान संशोधन के साथ अनुच्छेद 48(ए) और 51(ए)(जी) के जुड़ने के बाद स्थितियां बिल्कुल साफ हो गई है जो कि गोवंश की रक्षा पूरी तरह सुनिश्चित करता है।
समाज में भ्रम की स्थिति अब भी बनी हुई है जहां कुछ धर्म विशेष के लोग, अपने धर्म के आधार पर गोवध के समर्थन पर बात करते हैं। वहीं ऐतिहासिक दृष्टि से यह समझ आता है कि मुगल काल के दौरान बाबर ने गोवध निषेध की हिमायत की जिस परंपरा को उसके आने वाले वंशज, हुमायूं, अकबर, जहांगीर ने कायम रखा। संदर्भ यहां तक आता है कि दक्षिण में हैदर अली ने तो गोवध करने वाले एक व्यक्ति के हाथ काटने के आदेश दे दिए थे। इसी तरह दारा शिकोह अहमद शाह तथा रस खान के बारे में भी संदर्भ आता है कि वह गौ-रक्षा के समर्थक रहे हैं। हिंदू धर्म में तो गोवंश जीविका के सिद्धांत को ही प्रतिपादित करता है। हिंदू दर्शन इस बात को झुठलाता रहा है कि ‘जीवै जीव आहार’ एक गोवंश का पूरा जीवन सर्वविदित रूप से मानव जीवन का पूरक है। कहीं भी दोनों के जीवन में विरोधाभास दृष्टिगत नहीं होता है। उत्तर प्रदेश गौ संवर्धन इंक्वायरी समिति ने अपनी 1953 की रिपोर्ट में गौ-वध को पूरी तरह प्रतिबंधित करने की अनुशंसा सर्वसहमति से की थी जिसके सारे सदस्य मुस्लिम थे।
वर्तमान में गोवंश की उपयोगिता बढी है। आज जबकि उर्वरक और कीटनाशक आम जीवन में दखल देते हुए कर्करोग जैसे असाध्य रोगों का कारण बन गए हैं, जैविक खाद और जैविक खेती वैज्ञानिक रूप से एकमात्र विकल्प देखे जा रहे है। ऐसे में गो-वंश संवर्धन एवं संरक्षण देश और समाज के लिए पूर्ण मार्ग है और अगर यह कहा जाए कि भविष्य का मानव जीवन, गो-वंश और गौ- संवर्धन बिना सम्भव नहीं है, तो यह बात अतिशयोक्ति नहीं होगी। केवल धर्म व आस्था से जुड़ना व वैज्ञानिक आधार को नजरअंदाज करना भविष्य के मानव जीवन को खतरे में डालने के बराबर है।आज भी हमारा देश कृषि प्रधान देश है। 72 फीसदी आबादी परोक्ष व अपरोक्ष रूप से खेती पर निर्भर है। रसायन व दवाओं का प्रयोग जहां एक तरफ मिट्टी की उर्वरा शक्ति को क्षीण कर रहा है, वही असाध्य रोगों को तीव्र गति से बढ़ा रहा है। कर्क (कैंसर) जैसी असाध्य बीमारी के मूल कारणों में यह एक कारण समझा जा रहा है। आज बेरोजगारी तथा गरीबी उन्मूलन में गौ संवर्धन, रक्षण, पालन एक प्रमुख आधार के रूप में सोचा जा रहा है।
हमें यह देखना है कि समाज के कुछ गिने-चुने लोगों की यह मांग है कि गोवंश संरक्षण नहीं होना चाहिए, जो कि उनके व्यापार को बाधित करता है। बड़े समाज के हित के विपरीत रखकर नहीं सोचा जा सकता।हमारा संविधान इस बात की इजाजत नहीं देता कि कुछ लोगों की व्यापारिक मांग को, बड़े सामाजिक हितों को नजरअंदाज करके,मान लिया जाए।
उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 जून 2020, उत्तर प्रदेश गौ रक्षा अधिनियम (उत्तर प्रदेश गौ हत्या निवारण संशोधन अधिनियम 2020) को पारित कर दिया है, जिसके तहत गौ-वध की अधिकतम सजा बढ़ाकर सश्रम 10 वर्ष कारावास कर दिया है और साथ में 10 लाख जुर्माने का प्रावधान रखा है। इसी तरह कुछ नए संशोधन, जो कि आवश्यक समझकर सरकार ने किए, जैसे कि गोवंश परिवहन करते हुए पाए जाने पर बरामद गोवंश के भरण- पोषण पर व्यय की वसूली, इत्यादि। किसी भी गोवंश द्वारा चारा ना देना व मरने के लिए छोड़ देना, परोक्ष व अपरोक्ष रूप से अपराध की परिधि में आएगा।
देश-काल परिस्थितियों मे बदलाव के साथ-साथ कानून में बदलाव हमेशा से ही तर्कसंगत रहा है। अपराध पर नियंत्रण के लिए समय-समय पर कानून में समुचित संशोधन करना, न केवल संवैधानिक है बल्कि न्याय को संपूर्णता देता है। शासन, न्याय शास्त्रों के आधार पर, देश-काल परिस्थितियों के अनुसार कानून व प्रक्रिया में सुसंगत बदलाव के लिए कटिबद्ध होता है और ऐसा न करने पर अपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है जिससे कि कानून और व्यवस्था पर दबाव बढ़ता है, जोकि ये अराजकता, भय, विद्रोह, असंतोष की स्थिति पैदा करता है और सुशासन के विरोधाभासी तत्व है। प्रबुद्ध नागरिकों में व कानूनविदो में सहज रूप से एक बहस चल निकली है कि उक्त अध्यादेश, न्याय के नियमों एवं परिकल्पनाओं से सुसंगत ना होकर के ‘अपराध के अनुसार दंड’ के आधारभूत सिद्धांत को धता बताता है। हालांकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अपराध नियंत्रण में सजा की अवधि हमेशा एक निवारक होता है। यदि सजा की अवधि कम होती है तो अपराध से संबंधित कानून मायने नहीं रख पाते, इसलिए कड़ी सजा का प्रावधान ऐतिहासिक रूप से अपराध रोकने में सक्षम पाया गया है। अलाउद्दीन खिलजी ने कम तोलने वाले हाथ को दंड देने का नियम रखा था जो कि उसकी बाजार व्यवस्था को एक उदाहरण के रूप में पेश किया। इसी तरह अंग्रेजी शासन के कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं जो कि हमारी दंड प्रक्रिया संहिता का आधार है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि दंड का विधान अपराध के अनुपातिक होना चाहिए परंतु देशकाल परिस्थितियों को देखते हुए इसमें सुसंगत एवं समसामयिक बदलाव आवश्यक होता है। यह पहली बार नहीं है कि उत्तर प्रदेश में गौ-हत्या संबंधित कानून में संशोधन किया गया है। पहले भी इस विधान और नियमावली में समय-समय पर बदलाव किए जाते रहे है 1958,1961,1979 और 2002 में कानून में बदलाव हुए हैं। 1964 और 1979 में नियमावली में बदलाव हुआ है। लगभग 20 से अधिक प्रदेशों में गोवंश वध निरोधक कानून अपने-अपने तरीके से लागू होते रहे हैं। केरल, पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोड़कर, पूरे देश में इससे संबंधित कड़े कानून बने हैं जो पूरी तरीके से गोवंश वध-निषेध करते हैं और कड़ी सजा का प्रावधान रखते हैं।
उत्तराखंड सरकार ने ‘उत्तराखंड प्रोटेक्शन ऑफ प्रोजेंसी एक्ट 2005’ पारित किया जिसमें गोवंश वध के लिए 10 साल की सजा का प्रस्ताव किया गया जो कि अंततः पास हुआ। इसी तरह उत्तर प्रदेश सरकार पहली सरकार नहीं है जो गोवध को अपराध की उच्च श्रेणी में शामिल कर 10 साल की सजा का प्रावधान किया है। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ष्आलम अली वर्सेस स्टेटष् में फैसला देते हुए 30 बिंदुगत निर्देश दिए, जिसमें गोवंश को ढोने, पालने, छोड़ने आदि से संबंधित सभी परिस्थितियों को विस्तार से चर्चा करते हुए बिंदुवार निर्देश दिए। माननीय कोर्ट को गार्जियन माना। अंततः सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कानून अति कड़ा होने से न्याय के सिद्धांतों के प्रतिपादन में बाधा आती है। दंड, अपराध के समानुपातिक होना चाहिए। ऐसा नहीं होने पर न्याय के सिद्धांतों को हानि पहुंचती है।
उत्तर प्रदेश में छोटे और मझोले किसानों को छुट्टे गोवंश से हानि पहुंचती रही है, जो कि सार्वजनिक सच से दृष्टिगत होता रहा है। सरकार के प्रयासों के बावजूद भी इस समस्या पर काबू नहीं पाया जा सका। किसान पशुपालक बछड़ों और वृद्ध गोवंश की उपयोगिता को ना समझते हुए उन्हें छोड़ देते हैं, जो कि अन्य किसानों के लिए एक समस्या है। किसान नीलगाय से पहले से ही परेशान थे और अब छुट्टा मवेशियों से परेशानी और बढ़ गई है। जस्टिस राजीव शर्मा ने ‘आलिम अली बनाम स्टेट ऑफ उत्तराखंड’ में इस बात की भी चर्चा की और बिंदुगत निर्देश में उत्तराखंड कानून को दृष्टिगत रखते हुए यह भी कहा कि जानबूझकर मवेशियों को छोड़ देना भी अपराध की श्रेणी में आता है। गौ-हत्या निवारण संशोधन अध्यादेश 2020 कहीं न कहीं उन किसानों को भी आशान्वित कर रहा है।
जिनकी फसलें छुट्टे गोवंश के कारण नष्ट हो रही हैं। मुझे आशा है कि उत्तर प्रदेश सरकार इन संशोधनों की श्रेणी में यह भी जोड़ने का प्रयास करे कि गरीब किसान जो कि छुट्टे मवेशी से त्रस्त है, उनको इस एक्ट के माध्यम से कुछ और कंपेनसेशन मिले। ग्रामीण परिवेश के युवाओं को विज्ञान आधारित ट्रेनिंग देते हुए, गोवंश की उपयोगिता को बताया जाए और गोवंश आधारित रोजगार परक शिक्षा देते हुए प्रेरित किया जाए, जो कि बिना लाभ की आकांक्षा के सिद्धांत को अमल में लाए बिना संभव नहीं है। युवा वर्ग तब तक गौ- संरक्षण व पालन की तरफ आकर्षित नहीं होगा जब तक कि सरकार द्वारा धन लाभ आदि की प्रेरणा नहीं मिलेगी।
निश्चित रूप से उत्तर प्रदेश में छोटे व मझोले किसानों को छुट्टे गोवंश से हानि हो रही है और इस विषय में बहस भी सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर चल रही है। यह अलग विषय है कि किसान, गोवंश के बारे में वैज्ञानिक ज्ञान ना होने के कारण इनको अनुपयोगी समझ कर के छोड़ दे रहे हैं, जिससे कि किसानों की फसलों को नुकसान हो रहा है। परंतु, यदि इनको इस विषय को लेकर शिक्षित किया जाए, तो शायद यह 16 वर्ष से पुराने गोवंश को भी, या अन्य गोवंश को अनुपयोगी ना समझकर इनका उपयोग खाद बनाने व अन्य काम में ला सकते हैं। आज युवाओं में बेरोजगारी व्याप्त है और ऐसे में अगर युवाओं को गोवंश पालन की तरफ आकर्षित किया जाए, तो आंशिक या पूर्ण रोजगार की समस्या से कुछ हद तक निदान पाया जा सकता है। ऐसा निश्चित करने के लिए यह आवश्यक होगा कि युवाओं मे गोवंश पालन की तरफ रुचि पैदा की जाए तथा उनमें इससे लाभ कराने की आकांक्षा भी। युवाओं के मन में यह बात सुनिश्चित करनी पड़ेगी कि गोवंश पालन एक फायदे का सौदा है और साथ ही ऐसा करके युवा अपना योगदान पर्यावरण संरक्षण में तथा देश के मौलिक विकास में दे सकते हैं। पशुपालन और कृषि आधारित ढेर सारी योजनाएं सफल नहीं हो पाई, हालांकि सरकार ने उसके लिए काफी प्रयास किया। इसके मूल में कुल मिलाकर यह कारण रहा कि युवाओं को यह योजनाएं फायदे का सौदा नहीं समझ में आई। वैसे भी कोई भी योजना अगर धंधे में लाभ सुनिश्चित नहीं करती तो धरातल पर सफल नहीं मानी जाती और महज एक पुस्तककीय परिकल्पना मात्र रह जाती है। निश्चित रूप से युवाओं को येन केन प्रकारेण, पशुपालन और खेती की तरफ आकर्षित करना पड़ेगा और उसके लिए युवाओं को लाभ हो, ऐसा सुनिश्चित करना पड़ेगा चाहे सब्सिडी के माध्यम से ही क्यों ना हो।
आशा है कि तंत्र इस तरफ ध्यान देगा। आत्मनिर्भर उत्तर प्रदेश, स्किल्ड उत्तर प्रदेश, मजदूरों का ही नहीं किसानों व पशुपालकों का उत्तर प्रदेश तथा अंत में नव आत्मनिर्भर व्यवसायियों का उत्तर प्रदेश, समय की मांग है।
(यह लेखक के निजी विचार हैं)
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