आरएसएस के उपक्रम ‘पर्यावरण संरक्षण गतिविधि’ की जल संरक्षण हेतु सुझाव व क्रियान्वयन विषय पर वर्चुअल संगोष्ठी सम्पन्न

उद्बोधन देते अनुराग जी, प्रचारक आरएसएस, झाँसी महानगर 

शुभम श्रीवास्तव
झांसी, 16 मई 2021 (दैनिक पालिग्राफ)। पर्यावरण संरक्षण गतिविधि, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्वावधान में रविवार को सायं एक वर्चुअल संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी की अध्यक्षता राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ झांसी महानगर के महानगर प्रचारक अनुराग जी ने की।
21वीं सदी के पहले दशक के पूरे विश्व में दृष्टि डालें तो यह सत्य उभरता है कि इस दशक में पूरी मानवता कई प्राकृतिक विपदाओं से जूझ रही है। कभी बर्फबारी, कभी बाढ़, कभी समुद्री तूफान, कभी भूकम्प, कभी महामारी तो कभी जल संकट से पूरी मानवता त्रस्त है। बढ़ती आबादी के सामने सबसे बड़े संकट के रूप में जल की कमी ही उभर रही है। पर्यावरण के साथ निरंतर खिलवाड़ का यह नतीजा है कि आज पूरी जनसंख्या हेतु पर्याप्त स्वच्छ जल के संकट से पूरा विश्व गुजर रहा है।
बताते चलें कि जिस तरह से गर्मी के आते है जल संकट अपने पांव पसारता जा रहा है। ऐसे में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उपक्रम पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के तत्वावधान में जल संरक्षण हेतु सुझाव व क्रियान्वयन विषय पर वर्चुअल संगोष्ठी सम्पन्न हुई। संगोष्ठी का शुभारम्भ संगठन मंत्र बोलकर किया गया। सर्वप्रथम संगोष्ठी में उपस्थित सभी पर्यावरण प्रमियों एवं संघ के दायित्ववान व्यक्तियों का आपस में परिचय किया गया। उसके बाद सभी ने बारी-बारी से जल संरक्षण के उभरते संकट से पर्यावरण के लिए हो रहे अहित को रोकने के लिए अपने-अपने विचार व्यक्त किये।
पर्यावरण संरक्षण गतिविधि के महानगर संयोजक पंकज लवानिया ने कहा कि जल संरक्षित करने की शुरुआत हमें अपने घर से करना चाहिए। वहीं, महानगर मातृशक्ति प्रमुख गरिमा जी ने वाटर हार्वेस्टिंग व ग्राउंड वाॅटर रिचार्ज आदि तकनीकों के माध्यम से जल को संरक्षित करने का उपाए बातया।
वरिष्ठ समाजसेवी राकेश सेन ने कहा कि जल के एकत्रीकरण करने लिए समय निकालकर बैठ कर चर्चाएं की जाए। भारत में उपलब्ध जल संसाधन की दृष्टि से आकलन करें तो यह बात सामने आती है कि 2001 में प्रति व्यक्ति 1800 क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध था जो 2050 ई. में घटकर 1000 क्यूबिक मीटर हो जाएगा। भारत इस समय कृषि उपयोग हेतु तथा पेयजल के गंभीर संकट से गुजर रहा है और यह संकट वैश्विक स्तर पर साफ दिख रहा है। हर विकसित और विकासशील देश इस संकट को दूर करने हेतु हर तरह से उपाय पर विचार कर रहा है। इस संकट के निवारण हेतु हमें तीन स्तरों पर विचार करना होगा-पहला यह कि अब तक हम जल का उपयोग किस तरह से करते थे? दूसरा भविष्य में कैसे करना है? तथा जल संरक्षण हेतु क्या कदम उठाएं? पूरी स्थिति पर नजर डालें तो यह तस्वीर उभरती है कि अभी तक हम जल का उपयोग अनुशासित ढंग से नहीं करते थे तथा जरूरत से ज्यादा जल का नुकसान करते थे।
बैठक में उपस्थित सभी स्वयंसेवकों ने बारी-बारी से अपने जल संरक्षण हेतु अपने सुझावों को बताया। निष्कर्षतः ‘जल संरक्षण’ आज के पूरे विश्व की मुख्य चिंता है। प्रकृति हमें निरंतर वायु, जल, प्रकाश आदि शाश्वत गति से दे रही है लेकिन हम विकास की आंधी में बराबर प्रकृति का नैसर्गिक संतुलन बिगाड़ते जा रहे हैं। जल संरक्षण हेतु समय रहते चेत जाने की जरूरत है क्योंकि-
‘रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून
पानी गए न उबरे, मोती, मानुस, चून’।
बैठक का संचालन शुभम श्रीवास्तव ने किया एवं आभार पंकज लवानिया जी ने व्यक्त किया। इस दौरान पंकज लवानिया, योगेश्वर, गरिमा, राकेश सेन, अंकित राय, कुलदीप त्रिपाठी, तरुण कुन्द्रा, दीपक मौर्या, शिवम श्रीवास्तव, रामनरेश पाठक आदि स्वयंसेवक एवं पर्यावरण प्रेमी उपस्थित रहे।

जागरुकता ही जल संरक्षण का सबसे बड़ा उपाय: अनुराग जी (महानगर प्रचारक, आरएसएस)

संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे राष्ट्रीय  स्वयं सेवक संघ झांसी महानगर के महानगर प्रचारक अनुराग जी ने कहा कि जल संरक्षण का सबसे बड़ा उपाय जागरुकता ही है, क्योंकि जब हम स्वयं जागरुक होंगे तभी दूसरों को कर पाएंगें। जल संरक्षण के लिए सर्वप्रथम हम सभी को एकजुट होकर जल संरक्षण को मजबूती प्रदान करना है। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण के साथ-साथ वृक्षारोपण भी जरुरी है। उन्होंने कहा कि हमें सर्वप्रथम अपने-अपने घरों से इसका पालन सुनिश्चित करें।

जल संरक्षण हेतु संगोश्ठी में दिए गए सुझाव
1. हर नागरिक में जल संरक्षण हेतु जागरूकता लानी होगी।
2. हर नागरिक शावर की जगह बाल्टी में पानी भरकर स्नान करें।
3. सेविंग करते समय नल बंद रखें।
4. बर्तन धुलते समय नल के स्थान पर टब का प्रयोग करें।
5. उत्तराखंड जल संसाधन के अनुसार, ‘‘टॉयलेट में लगी फ्लश की टंकी में प्लास्टिक की बोतल में पानी भरकर रख देने से हर बार एक लीटर जल बचाया जा सकता है।
6. गाँव और शहरों में पहले तालाब हुआ करते थे जिनमें जल एकत्र रहता था जो न केवल पानी के स्तर को आस-पास बचाये रखता था बल्कि दैनिक उपयोग के काम आता था। आज गाँवों और शहरों के तालाबों को पाट कर घर बना लिये गए हैं। अतः जरूरी है कि जल संरक्षण हेतु गाँव और शहरों में तालाब फिर से खोदे जाएँ।
7. गंदे जल का सिंचाई में उपयोग करके भी जल संरक्षण किया जा सकता है।
8. वर्षा का जल छत पर संरक्षण कर उसका उपयोग करना। इसलिये छत पर पानी टंकी बनाना होगा।
9. सार्वजनिक स्थल के नल की टोटी अक्सर खराब रहती है उसकी मरम्मत कर तथा लोगों में जागरूकता लाकर हजारों लीटर पानी संरक्षित किया जा सकता है।
10. पर्यावरण के प्रति जागरूकता जरूरी है क्योंकि पर्यावरण संतुलन का सकारात्मक प्रभाव जल संरक्षण पर पड़ता है। कटते वृक्षों के कारण भूमि की नमी लगातार कम हो रही है जिससे भूजल स्तर पर बुरा असर पड़ रहा है। अतः जरूरी है कि वृक्षारोपण कार्यक्रम हेतु जागरूकता लाई जाए।
11. नदियों के जल में गंदा पानी कदापि नहीं छोड़ा जाय जिससे जरूरत पर उस जल का प्रयोग पीने तथा अन्य उपयोगों हेतु किया जा सके।
12. ‘जल संरक्षण’ विषय को व्यापक अभियान की तरह सरकारी और गैर सरकारी दोनों स्तरों पर प्रचारित करने की जरूरत है। जिससे छोटे, बड़े सभी इस विषय की गंभीरता को समझें और इस अभियान में अपनी भूमिका अदा करें।
13. जल संरक्षण हेतु केंद्र और राज्य सरकारें कानून बनाएँ।
14. विद्यालय और महाविद्यालयों में निरंतर प्रचार-प्रसार की जरूरत है। जिससे युवा पीढ़ी समय रहते इसकी गंभीरता को अच्छी तरह से समझ सकें।
15. जल संरक्षण हेतु रेनवाटर हार्वेस्टिंग तकनीक का सहारा लेना चाहिए। यह तकनीक पानी की कमी से निपटने का तरीका भर नहीं है, कई बार तो ऐसा देखने में आया है कि इस तकनीक से इतना जल एकत्र हो जाता है कि दूसरे स्रोत की आवश्यकता ही नहीं पड़ती और यहाँ तक कि दूसरे को पानी उधार देने में सक्षम हो जाते हैं।

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